किसे पता था कि दो बहनों की अनबन की
कहानी बॉलीवुड के फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज को इतनी पसंद आ जाएगी कि
वो इस पर फ़िल्म 'पटाखा' बना देंगे.
बॉलीवुड के निर्देशक जिनको
क़िताबों में गढ़ी कहानियों से एक अनोखा लगाव रहा है, जिन्होंने शेक्सपीयर
के 'हैमलेट' से प्रेरित होकर 'हैदर' बनाई, उन्होंने एक दिन चरण सिंह 'पथिक'
की क़िताब 'पीपल के फूल' से एक कहानी पढ़ी, 'दो बहनें.' उसको पढ़ने के बाद विशाल भारद्वाज इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने इस कहानी के लेखक से संपर्क कर इसको रुपहले पर्दे पर उतारने की ठान ली.
शेक्सपीयर की कहानियों पर अपनी फ़िल्में सजाने वाले निर्देशक जब चरण सिंह 'पथिक' के लेखन से इतने प्रभावित हुए तो लगा कि इस फ़िल्म के ज़रिए दो बहनों की कहानी से तो आप सिनेमाघरों में रू-ब-रू होंगे, क्यों ना हम आपको चरण सिंह 'पथिक' की कहानी से रूबरू कराएं.
राजस्थान में करौली ज़िले के रौंसी गांव में चरण सिंह 'पथिक' रहते हैं और अपने गांव से 12 किलोमीटर दूर स्थित केमरी गांव में एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने जाते हैं.शे से अध्यापक, चरण सिंह 'पथिक' कभी क्रिकेटर बनने का ख़्वाब देखा करते थे लेकिन वह सपना केवल ज़िला स्तर तक सिमटकर रह गया.
लेकिन हमेशा से कुछ अलग करने की चाह उन्हें अपने दो भाइयों से अलग बनाती थी.
वह खाली समय में प्रेमचंद की कहानियां पढ़ने लगे और धीरे-धीरे लेखनी की तरफ़ उनका रुझान बढ़ने लगा.
सरकारी स्कूल में पढ़ाते-पढ़ाते उन्होंने क़िताबें लिखना शुरू किया और फिर 2005 में उनकी पहली क़िताब 'बात ये नहीं है' प्रकाशित हुई. ऐसा करते-करते क़रीब 4 क़िताबें उन्होंने लिखी जिनमें से एक थी 'पीपल के फूल'हां एक दिलचस्प बात का ज़िक्र करना ज़रूर है जिसका ज़िक्र चरण सिंह 'पथिक' ने किया जब बीबीसी ने उनसे बातचीत की.
उनकी क़िताब 'पीपल के फूल' में लिखी कहानी 'दो बहनें' दरअसल असली कहानी है और चरण सिंह 'पथिक' के बड़े भाई की बीवी और छोटे भाई की बीवी की असल ज़िंदगी से प्रेरित है.
चरण सिंह के बड़े भाई की बीवी और छोटे भाई की बीवी आपस में बहने हैं और उनकी आम ज़िंदगी की नोक-झोंक को चरण सिंह ने अपनी कल्पनाओं के सहारे अक्षरों में पिरोया.
इस कहानी को जब विशाल भारद्वाज ने पढ़ा तो उन्होंने लेखक चरण सिंह 'पथिक' से संपर्क किया और फिर उनके गांव भी गए और उनकी भाभी और छोटे भाई की बीवी से भी मिले. विशाल भारद्वाज तीन दिन वहीं रहे.
विशाल भारद्वाज ने चरण सिंह 'पथिक' को मुंबई बुलाया. जिसके बाद उन्होंने फ़िल्म बनने के हर पड़ाव पर लेखक के साथ कदम से कदम मिलाकर कहानी को फ़िल्म का स्वरूप दिया. यहां तक कि 'पटाखा' की कास्ट - सान्या मल्होत्रा, सुनील ग्रोवर और राधिका मदान की वर्कशॉप भी उनके साथ कराई और राजस्थान में भी सबकी वर्कशॉप हुई.
अब चरण सिंह की कल्पना को विशाल भारद्वाज के पंख लग गए हैं और 'पटाखा' की उड़ान भर रहे हैं. चरण सिंह 'पथिक' ने बताया कि उनकी ये कहानी अब 'पेंगुइन' प्रकाशन में छपेगी और दोनों भाषाओं यानी कि हिंदी और अंग्रेज़ी में छपेगी.
जब उनसे ये सवाल पूछा गया कि बॉलीवुड जब किसी अंग्रेज़ी भाषा के रचनाकार की क़िताब से प्रेरित होकर फ़िल्म बनाता है तो उस लेखक की क़िताबों की बिक्री और लेखक का ओहदा बढ़ जाता है, क्या ऐसा ही उनके साथ भी हो रहा है?
उन्होंने हिंदी साहित्यकारों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए कहा, "ये बेहद दु:खद है कि लोग हिंदी साहित्यकारों को उतनी तवज्जो नहीं देते जितने के वो हक़दार हैं. चेतन भगत के एक नॉवेल पर फ़िल्म बनती है और उनकी क़िताबें बाज़ार में बिकने को बिछ जाती है. वहीं आप किसी हिंदी साहित्यकार के साथ ऐसा होते कम ही देख पाते हैं."
उन्होंने ये भी बताया कि इस फ़िल्म के बाद उनके पास उस स्तर की रॉयल्टी नहीं आई जिस तरह की उम्मीद लोग कर रहे हैं.
हालांकि फ़िल्म के लिए उन्हें मिले पैसों से चरण सिंह 'पथिक' संतुष्ट हैं. रे दोस्त ने पूछा, "अभी भी उसी के बारे में सोच रहे हो?" मैंने कोई उत्तर नहीं दिया.
उसने फिर जैसे कोई सुई चुभोई, "चुप रहोगे तो इसका मतलब ये नहीं कि तुम अधिक सयाने हो."
वह बोला, "तुम पागल ही हो सकते हो. तुम्हारा अफ़ेयर तो सालों पहले ख़त्म हो गया. लेकिन तुम ज़िंदगी में आगे बढ़ नहीं पाए... अब छोड़ो, ग्रो-अप. तुम्हें वक़्त के साथ समझदार होना चाहिए."
मैंने कहा, "क्या.... तुम्हारी समस्या क्या है? ये मेरी पसंद का मामला है."
मुझे लगा कि मैं उसे एक मुक्का मारूं. लेकिन मैं आख़िर कितने लोगों को ऐसे मार सकता हूं?
अगर मुझे ग़ुस्सा ही करना है और इस सवाल के लिए किसी को मुक्का मारना है तो मुझे रोज़ाना यही काम करना होगा.
मेरी कहानी क्या है? मैं कहां से शुरू करूं?
मेरी कहानी मेरे गुज़रे वक़्त और आज से जुड़ी है. प्यार में नाकाम होने के बाद मैंने अकेला यानी सिंगल रहने का फ़ैसला किया.
ये उस समाज के लिए एक बड़ा प्रश्न बन गया है जिसके साथ मेरा रोज़ का नाता है.
मुझे अपने फ़ैसले के लिए क्या सहना पड़ा? फ़ैसले से किसी और को क्या परेशानी है?
मेरे दोस्त, रिश्तेदार और जाननेवाले मुझे अनूठा (अलग कह लें) मानते हैं. मेरे टैलेंट, मेरे काम या फिर मेरे गुणों के कारण नहीं बल्कि मेरे 'सिंगल' होने की सामाजिक पहचान के कारण वो मुझे ख़ुद से अलग मानते हैं.
अगर आप इन दोनों सवालों के जवाब में ये कहते हैं कि आप न तो शादीशुदा हैं और न ही कमिटेड तो कई लोगों को आश्चर्य होना स्वाभाविक है. इस बात की अधिक संभावनाएं हैं कि आपको अलग या अजीब प्राणी की तरह देखा जाए और आपकी तरफ़ लोगों की संवेदना भरी नज़रें उठ जाएं.
काम के सिलसिले में एक महानगर से दूसरे महानगर आ गया. मैं एक ऐसे माहौल में काम करता हूं जहां अलग-अलग जगहों से आकर लोग काम कर रहे हैं. मैं शहर के एक संभ्रांत इलाके में रहता हूं. यहां रह रहा हर कोई आधुनिक है और अपने काम से काम रखता है.
पड़ोसियों के पास मुझसे बात करने और मुझे जानने का कम ही समय है.
जिस जिम में मैं जाता हूं और जिस चाय की दुकान पर मैं रोज़ चाय पीता हूं, वो सभी अपने काम से काम रखते हैं. उनके साथ औपचारिक बातचीत ही होती है.
लेकिन जैसी ही उन्हें मेरे सिंगल होने का पता चलता है उनके बीच का "जिज्ञासु व्यक्ति" छटपटाने लगता है.
"क्या आप अब भी सिंगल ही हो?" पूछने वाले की आंखें चमक उठती हैं. ऐसा लगता है कि आप अब भी प्लेस्कूल में ही हैं.
ऐसे मौक़ों पर मेरे कुछ दोस्त ही आगे बढ़ मेरे बारे में बताते हैं, "इस साल के आख़िर तक ये शादी कर लेगा."
इन दोस्तों को लगता है कि ऐसा बोलकर वो मुझे अपमान से बचा लेंगे. मेरी इच्छा होती है कि मैं कहूं, "अरे सुनो! मुझे अपनी पहचान से कोई शर्म नहीं है. और तो और जिस साल का आप ज़िक्र कर रहे हैं, वो कभी आएगा ही नहीं. "
और फिर क़रीबी लोग ही मेरा नाम लड़कियों के नाम से जोड़ना शुरू कर देते हैं, बिना ये सोचे कि हमारी उम्र में कितना फ़र्क़ है, हमारे ओहदे में कितना फ़र्क़ है. इस तरह की अफ़वाहें हर जगह फैलती रहती हैं.
लोगों को इस बात का अंदाज़ा ही नहीं होता कि उनके ऐसे व्यवहार के कारण उनके साथ मेरा संबंध ख़त्म हो रहा है. सच कहूं तो दुनिया में अच्छे दोस्तों का मिलना वैसे भी बेहद मुश्किल है.
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