Monday, October 15, 2018

यौन उत्पीड़न के आरोप झूठे, करूंगा क़ानूनी कार्रवाई: एम जे अकबर

कई महिलाओं द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने के बाद विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर ने रविवार को कहा कि वो आरोप लगाने वाली महिलाओं के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करेंगे.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, एम.जे. अकबर ने बयान जारी करके कहा कि उनके ऊपर जो आरोप लगाए गए हैं, वे फ़र्ज़ी हैं और राजनीति से प्रेरित हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने ख़ुद पर लगे आरोपों पर पहले बयान इसलिए नहीं दिया था क्योंकि वह आधिकारिक दौरे पर देश से बाहर थे.
अकबर ने कहा कि कुछ तबकों में बिना सबूत के आरोप लगाना आजकल आम हो गया है.
इसके अलावा उन्होंने सवाल किए, "आम चुनावों से पहले यह आंधी क्यों उठी है? इसके पीछे क्या कोई एजेंडा है? ये झूठे, आधारहीन आरोप हैं जो मेरी प्रतिष्ठा को नुकसान
उन्होंने कहा कि झूठ के पैर नहीं होते, लेकिन इनमें ज़हर होता है जो उन्माद पैदा कर सकता है, यह परेशान करने वाला है.
पहुंचाने के लिए लगाए गए हैं."
उन्होंने एक महिला पत्रकार प्रिया रमानी द्वारा लेख लिखकर यौन दुर्व्यवहार के आरोपों पर कहा कि रमानी ने कई सालों पहले एक पत्रिका में लेख लिखकर उनके ख़िलाफ़ कैंपेन शुरू किया था. उन्होंने कहा कि रमानी ने उनका नाम नहीं लिखा था क्योंकि उन्हें पता था कि यह ग़लत स्टोरी है.
वहीं, एशियन एज अख़बार में काम करने के दौरान एक अन्य महिला द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को भी अकबर ने झूठा बताया. उन्होंने कहा कि यह भी याद रखने की बात है कि इन दोनों महिलाओं ने इन कथित घटनाओं के बाद भी उनके साथ काम करना जारी रखा.
अकबर ने सवाल किया कि क्या वजह थी जो वे दिनों महिलाएं इतने दिनों तक चुप रहीं.
विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर रविवार सुबह नाइजीरिया के दौरे से भारत लौटे. एयरपोर्ट के बाहर पत्रकारों ने अकबर को घेर लिया और उनसे इन आरोपों पर अपनी बात रखने को कहा.
उस समय अकबर ने कहा कि वह अपना बयान बाद में जारी करेंगे.
अब तक 10 से अधिक महिलाएं #MeToo के ज़रिए एमजे अकबर पर यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप लगा चुकी हैं. ये अधिकतर महिलाएं अकबर के साथ अलग-अलग मीडिया संस्थानों में काम कर चुकी हैं.
सोशल मीडिया पर चल रहे #MeToo अभियान के दौरान फ़िल्म, मीडिया जगत की जानी-मानी हस्तियों के नाम सामने आए हैं जिनमें महिलाओं ने उन पर यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं.
विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर पर 'प्रीडेटरी बिहेवियर' के आरोप हैं जिसमें युवा महिलाओं को मीटिंग के नाम पर कथित तौर पर होटल के कमरे में बुलाना शामिल है.
देश के सबसे प्रभावशाली संपादकों में से एक रहे एमजे अकबर, द टेलीग्राफ़, द एशियन एज के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर रहे हैं.
सबसे पहले उनका नाम सोमवार को वरिष्ठ पत्रकार प्रिया रमानी ने लिया था. उन्होंने एक साल पहले वोग इंडिया के लिए 'टू द हार्वे वाइंस्टींस ऑफ़ द वर्ल्ड' नाम से लिखे अपने लेख को रीट्वीट करते हुए ऑफिस में हुए उत्पीड़न के पहले अनुभव को साझा किया.
रमानी ने अपने मूल लेख में एम.जे. अकबर का कहीं नाम नहीं लिया था, लेकिन सोमवार को उन्होंने ट्वीट किया कि वो लेख एम.जे. अकबर के बारे में था.
उसके बाद से पांच अन्य महिलाओं ने भी एम.जे. अकबर से जुड़े अपने अनुभव साझा किए हैं.हले दुनिया के बाक़ी हिस्सों और फिर अब भारत में कई महिलाओं की ओर से सोशल मीडिया पर #MeToo चलाया जा रहा है जिसमें वह अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहारों को साझा कर रही हैं.
सोशल मीडिया का यह #MeToo आंदोलन पाकिस्तान में भी नज़र आने लगा है.
भारत में पिछले कुछ अर्से से दर्जनों महिलाओं ने सोशल मीडिया पर राजनीतिक जगत से लेकर फ़िल्म और मीडिया की दुनिया के नामी-गिरामी लोगों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं.
इस ताज़ा मामले की शुरुआत तब हुई जब बॉलिवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अभिनेता नाना पाटेकर पर कई सालों पहले एक फ़िल्म के सेट पर दुर्व्यवहार के आरोप लगाए थे. इसके बाद महिला कॉमेडियन्स से लेकर पत्रकार, राजनेता, अभिनेता और फ़िल्म निर्देशक तक पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे.

Monday, October 8, 2018

达沃斯论坛探讨落实气候行动

年一度的世界经济论坛 ( )于今日在瑞士滑雪胜地达沃斯开幕。此次论坛将为各国政府和企业提供一个探讨如何将巴黎气候协议付诸实践的机会。

会议的召开适逢世界面临全球变暖威胁之际,世界经济论坛上周发布的一篇报告显示,粮食安全及气候变化是商业精英最关注的问题之一。

联合国气候大会主席克里斯蒂·菲格雷斯周三上午在世界经济论坛专题讨论会上说道:签订《巴黎气候协议》只是"容易的环节",现在的任务是加快世界能源体系转型的步伐。

政商两界领导人
齐聚一堂,恰逢石油价格滑落至近十年最低点,新兴经济体发展日益趋缓。石油、煤炭、铁矿石等主要大宗商品需求疲软、供应过剩的现状让各国政府再一次意识到,化石燃料和能源密集型自然资源将是一个越来越不确定的因素,并有可能危及未来的规划和预算。

三上午的专题讨论会就化石燃料价格走低将会在何种程度上阻碍可再生能源和电动汽车的发展进行了辩论。在最近的这次油价暴跌之前,可再生能源和电动汽车已经逐渐可以与化石燃料相抗衡。

年年底,随着汽油价格的下滑,美国电动汽车的销售出现停滞,而高油耗汽车的需求却大幅增长。

源专家表示,由于中国、欧盟和美国等国政府采取碳交易、税收等激励措施鼓励从汽油发动机和化石燃料发电向低碳转型。因此,长期来看,这些国家和地区对于石油和煤炭价格的下跌有足够的耐受力。

时,新技术带来的机遇日益显现,如大容量电池、蓄能设备、并网效率提升、自动化程度提高等。在达沃斯会议上,与会者思索“第四次工业革命”将会给劳动力、城市、以及能源生产和存储的方式带来怎样的影响。

保主义者常嘲讽达沃斯会议不过是那些只会夸夸其谈的全球精英们展示口才的地方。但除了联合国气候峰会,能让世界银行和联合国这种多边机构与世界最大的企业和数十名国家领导人就如何解决包括气候变化问题在内的全球性问题会谈的机会并不多。今年的会谈结果,仍需拭目以待。想一下,当你走进家门口一家普通的超市,货架上陈列有虎骨酒、鹿茸酒、冷冻鳄鱼肉、熊胆粉、麝香中成药、梅花鹿肉罐头、娃娃鱼等清一色由国家重点保护动物制成的产品,均明码标价、与柴米油盐等日常货物一道公开出售。

《野生动物保护法》二十六年以来第一次进行全面修订。目前正在征集社会意见的草案,第一次明确提出野生动物可以作为中医药药品、保健品和食品来进行经营利用。如果目前的草案最终成为法律, 那么开篇描述的那些场景很可能成为“合法”现实。

置身上述场景,你会认为中国成了一个更重视生态文明的社会吗?

《野生动物保护法》修改的大背景,是多部与生态和环境相关的法律集体大修,以全面清理现行法律法规中与推进生态文明建设不相适应的内容。然而,《野生动物保护法》目前草案的部分内容,却与当下建设生态文明和绿色社会的大趋势背道而驰。

《中共中央 国务院关于加快推进生态文明建设的意见》明确要求“切实保护珍稀濒危野生动植物”, 并且通过修改有关法律法规来“引导、规范和约束各类开发、利用、保护自然资源的行为”,并且“推动全民在衣、食、住、行、游等方面加快向勤俭节约、绿色低碳、文明健康的方式转变,坚决抵制和反对各种形式的奢侈浪费、不合理消费”。

食用珍贵、濒危野生动物,据报道从刑法解释来看,属于违法行为
;将濒危野生动物以药品和保健品来消费,是否合理、文明、健康,也值得质疑。

更值得注意的是,作为我国唯一的一部以野生动物保护为名的法律,草案却明文提出:因“人工繁育”等其它特殊需要,经省级主管部门批准,可捕猎国家重点保护野生动物;因“人工繁育、公众展示(演)等其它特殊需要”,经省级主管部门批准,可以出售、收购和利用国家重点保护野生动物及其制品。

国家重点保护动物是珍稀、濒危物种,对生态平衡有重要作用。更何况,上述条文没有限定人工繁育、公众展示(演)的具体目的,也就是说商业养殖也能获准猎捕、马戏团等商业机构也能获准买卖和利用国家重点保护野生动物。

去年二月,深圳某公安局长邀官员聚餐酒楼吃娃娃鱼,该新闻里的娃娃鱼就来自于养殖场。野生动物商业性繁育已经成为一个产业,而这个产业正将娃娃鱼这一极度濒危的物种逼上绝路。一份最近对娃娃鱼养殖业的研究发现,中国娃娃鱼的野生种群在过去三十年减少了百分之八十。由于繁育不易,娃娃鱼经常被从野外捕捉。面临类似情况的还有老虎、黑熊、梅花鹿、多种蛇类和龟类物种——快速增长的野生动物养殖产业变换着手段寻找商机,刺激了民众对野生动物制品需求。但是,野生动物制品并非必需品,往往属于奢侈消费、甚至是“拉关系”手段。因此,助长这样一个产业,与当下反腐倡廉的风气极其不符。

市场力量

其实,开篇的场景并不全是预言,绝大多数所列举的商品已经凭借职能部门的规章制度获得销售许可,却处于法律意义上的“灰色地带”。

自2003年,国家有关主管部门以公告的形式,分十几个批次公告了获得“中国野生动物经营利用管理专用标识”的企业及其产品。根据公开资料,获得上述标识的产品除了在国际上引得诸多争议后中国承诺终止销售的“象牙”之外,更包含几乎所有能想象到的珍贵野生动物制品。

以2007年的一份公告为例,公告的产品包括“含赛加羚羊角、穿山甲片、稀有蛇类成份的中成药;稀有蛇类原材料生产的乐器、皮具、皮件、保健食品、洗涤、化妆用品;虎皮、豹皮及其制品;野生动物标本;暹罗鳄鲜(冻)鳄肉制品、肉干系列制品、鳄鱼膏、保健酒;梅花鹿茸酒、鹿茸血酒、鹿血酒、鹿茸胶囊”等80多家企业百来种珍稀野生动物制品

一位热心动物保护法律的律师指出,中国野生动物经营利用乱象的根本原因是立法的错位和越位。他认为,国家林业局的部门规章利用了现行《野生动物保护法》中含糊的用词,使得一系列的严重违法行为在部门规章的遮掩下得以合法运作。

《野生动物保护法》草案,不但延续了旧法中模糊的用词,例如上述的“…等其它特殊需要”,还明确要制定一个允许利用人工繁育国家重点保护动物名录,第一次提出要将上述“标识”制度列入法律。

2013年,《国家重点保护野生动物驯养繁殖的管理条例》征求社会意见,社会各方强烈反对因商业目的驯养和利用国家重点保护野生动物,该条例腹死胎中。类似的提法再次出现在《野生动物保护法》的草案中,实属倒退。

以我国最濒危野生动物之一的老虎为例,目前国内仅存不到50头野生虎,却有超过5000头人工繁育老虎。按照国际标准,这些老虎多数不是以“保护野生虎种群”的目的所繁育。尽管联合国条约出于对野生虎的保护,要求关闭商业性质的老虎繁育场所。主管部门却对多数 “以虎养虎”的商业行为睁一只眼闭一只眼——中国两家最大的老虎养殖场所生产的保健酒,均被授予了“标识”可合法销售。老虎养殖业规模的快速扩大和政策上的松动,使得老虎的利用和贸易暗涛汹涌:国内近年有关老虎的奇闻怪事——雷州老板吃虎案、温州街头虎尸案、动物园虐虎事件以及非法流通多地来自马戏团的老虎等,这些都来自老虎人工繁育场所。

最近一份报告称,在过去四十年中,中国的陆生脊椎动物种群数量下降了一半,生物多样性丧失的情况非常严峻。目前正在修改中的《野生动物保护法》,仍然有机会成为挽救中国生物多样性的重要工具。其中关键一步,就是要暂停和关闭对国家重点保护动物的商业繁育,并且删除所有对国家重点保护动物经营利用的条款。

点击阅读《野生动物保护法》草案,并在欢迎2016年1月29日前提交您的意见

Tuesday, October 2, 2018

इस स्कूल टीचर ने लिखी 'पटाखा' फ़िल्म की बारूदी कहानी

किसे पता था कि दो बहनों की अनबन की कहानी बॉलीवुड के फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज को इतनी पसंद आ जाएगी कि वो इस पर फ़िल्म 'पटाखा' बना देंगे.
बॉलीवुड के निर्देशक जिनको क़िताबों में गढ़ी कहानियों से एक अनोखा लगाव रहा है, जिन्होंने शेक्सपीयर के 'हैमलेट' से प्रेरित होकर 'हैदर' बनाई, उन्होंने एक दिन चरण सिंह 'पथिक' की क़िताब 'पीपल के फूल' से एक कहानी पढ़ी, 'दो बहनें.'
उसको पढ़ने के बाद विशाल भारद्वाज इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने इस कहानी के लेखक से संपर्क कर इसको रुपहले पर्दे पर उतारने की ठान ली.
शेक्सपीयर की कहानियों पर अपनी फ़िल्में सजाने वाले निर्देशक जब चरण सिंह 'पथिक' के लेखन से इतने प्रभावित हुए तो लगा कि इस फ़िल्म के ज़रिए दो बहनों की कहानी से तो आप सिनेमाघरों में रू-ब-रू होंगे, क्यों ना हम आपको चरण सिंह 'पथिक' की कहानी से रूबरू कराएं.
राजस्थान में करौली ज़िले के रौंसी गांव में चरण सिंह 'पथिक' रहते हैं और अपने गांव से 12 किलोमीटर दूर स्थित केमरी गांव में एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने जाते हैं.शे से अध्यापक, चरण सिंह 'पथिक' कभी क्रिकेटर बनने का ख़्वाब देखा करते थे लेकिन वह सपना केवल ज़िला स्तर तक सिमटकर रह गया.
लेकिन हमेशा से कुछ अलग करने की चाह उन्हें अपने दो भाइयों से अलग बनाती थी.
वह खाली समय में प्रेमचंद की कहानियां पढ़ने लगे और धीरे-धीरे लेखनी की तरफ़ उनका रुझान बढ़ने लगा.
सरकारी स्कूल में पढ़ाते-पढ़ाते उन्होंने क़िताबें लिखना शुरू किया और फिर 2005 में उनकी पहली क़िताब 'बात ये नहीं है' प्रकाशित हुई. ऐसा करते-करते क़रीब 4 क़िताबें उन्होंने लिखी जिनमें से एक थी 'पीपल के फूल'हां एक दिलचस्प बात का ज़िक्र करना ज़रूर है जिसका ज़िक्र चरण सिंह 'पथिक' ने किया जब बीबीसी ने उनसे बातचीत की.
उनकी क़िताब 'पीपल के फूल' में लिखी कहानी 'दो बहनें' दरअसल असली कहानी है और चरण सिंह 'पथिक' के बड़े भाई की बीवी और छोटे भाई की बीवी की असल ज़िंदगी से प्रेरित है.
चरण सिंह के बड़े भाई की बीवी और छोटे भाई की बीवी आपस में बहने हैं और उनकी आम ज़िंदगी की नोक-झोंक को चरण सिंह ने अपनी कल्पनाओं के सहारे अक्षरों में पिरोया.
इस कहानी को जब विशाल भारद्वाज ने पढ़ा तो उन्होंने लेखक चरण सिंह 'पथिक' से संपर्क किया और फिर उनके गांव भी गए और उनकी भाभी और छोटे भाई की बीवी से भी मिले. विशाल भारद्वाज तीन दिन वहीं रहे.
विशाल भारद्वाज ने चरण सिंह 'पथिक' को मुंबई बुलाया. जिसके बाद उन्होंने फ़िल्म बनने के हर पड़ाव पर लेखक के साथ कदम से कदम मिलाकर कहानी को फ़िल्म का स्वरूप दिया. यहां तक कि 'पटाखा' की कास्ट - सान्या मल्होत्रा, सुनील ग्रोवर और राधिका मदान की वर्कशॉप भी उनके साथ कराई और राजस्थान में भी सबकी वर्कशॉप हुई.
अब चरण सिंह की कल्पना को विशाल भारद्वाज के पंख लग गए हैं और 'पटाखा' की उड़ान भर रहे हैं. चरण सिंह 'पथिक' ने बताया कि उनकी ये कहानी अब 'पेंगुइन' प्रकाशन में छपेगी और दोनों भाषाओं यानी कि हिंदी और अंग्रेज़ी में छपेगी.
जब उनसे ये सवाल पूछा गया कि बॉलीवुड जब किसी अंग्रेज़ी भाषा के रचनाकार की क़िताब से प्रेरित होकर फ़िल्म बनाता है तो उस लेखक की क़िताबों की बिक्री और लेखक का ओहदा बढ़ जाता है, क्या ऐसा ही उनके साथ भी हो रहा है?
उन्होंने हिंदी साहित्यकारों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए कहा, "ये बेहद दु:खद है कि लोग हिंदी साहित्यकारों को उतनी तवज्जो नहीं देते जितने के वो हक़दार हैं. चेतन भगत के एक नॉवेल पर फ़िल्म बनती है और उनकी क़िताबें बाज़ार में बिकने को बिछ जाती है. वहीं आप किसी हिंदी साहित्यकार के साथ ऐसा होते कम ही देख पाते हैं."
उन्होंने ये भी बताया कि इस फ़िल्म के बाद उनके पास उस स्तर की रॉयल्टी नहीं आई जिस तरह की उम्मीद लोग कर रहे हैं.
हालांकि फ़िल्म के लिए उन्हें मिले पैसों से चरण सिंह 'पथिक' संतुष्ट हैं. रे दोस्त ने पूछा, "अभी भी उसी के बारे में सोच रहे हो?" मैंने कोई उत्तर नहीं दिया.
उसने फिर जैसे कोई सुई चुभोई, "चुप रहोगे तो इसका मतलब ये नहीं कि तुम अधिक सयाने हो."
वह बोला, "तुम पागल ही हो सकते हो. तुम्हारा अफ़ेयर तो सालों पहले ख़त्म हो गया. लेकिन तुम ज़िंदगी में आगे बढ़ नहीं पाए... अब छोड़ो, ग्रो-अप. तुम्हें वक़्त के साथ समझदार होना चाहिए."
मैंने कहा, "क्या.... तुम्हारी समस्या क्या है? ये मेरी पसंद का मामला है."
मुझे लगा कि मैं उसे एक मुक्का मारूं. लेकिन मैं आख़िर कितने लोगों को ऐसे मार सकता हूं?
अगर मुझे ग़ुस्सा ही करना है और इस सवाल के लिए किसी को मुक्का मारना है तो मुझे रोज़ाना यही काम करना होगा.
मेरी कहानी क्या है? मैं कहां से शुरू करूं?
मेरी कहानी मेरे गुज़रे वक़्त और आज से जुड़ी है. प्यार में नाकाम होने के बाद मैंने अकेला यानी सिंगल रहने का फ़ैसला किया.
ये उस समाज के लिए एक बड़ा प्रश्न बन गया है जिसके साथ मेरा रोज़ का नाता है.
मुझे अपने फ़ैसले के लिए क्या सहना पड़ा? फ़ैसले से किसी और को क्या परेशानी है?
मेरे दोस्त, रिश्तेदार और जाननेवाले मुझे अनूठा (अलग कह लें) मानते हैं. मेरे टैलेंट, मेरे काम या फिर मेरे गुणों के कारण नहीं बल्कि मेरे 'सिंगल' होने की सामाजिक पहचान के कारण वो मुझे ख़ुद से अलग मानते हैं.
अगर आप इन दोनों सवालों के जवाब में ये कहते हैं कि आप न तो शादीशुदा हैं और न ही कमिटेड तो कई लोगों को आश्चर्य होना स्वाभाविक है. इस बात की अधिक संभावनाएं हैं कि आपको अलग या अजीब प्राणी की तरह देखा जाए और आपकी तरफ़ लोगों की संवेदना भरी नज़रें उठ जाएं.
काम के सिलसिले में एक महानगर से दूसरे महानगर आ गया. मैं एक ऐसे माहौल में काम करता हूं जहां अलग-अलग जगहों से आकर लोग काम कर रहे हैं. मैं शहर के एक संभ्रांत इलाके में रहता हूं. यहां रह रहा हर कोई आधुनिक है और अपने काम से काम रखता है.
पड़ोसियों के पास मुझसे बात करने और मुझे जानने का कम ही समय है.
जिस जिम में मैं जाता हूं और जिस चाय की दुकान पर मैं रोज़ चाय पीता हूं, वो सभी अपने काम से काम रखते हैं. उनके साथ औपचारिक बातचीत ही होती है.
लेकिन जैसी ही उन्हें मेरे सिंगल होने का पता चलता है उनके बीच का "जिज्ञासु व्यक्ति" छटपटाने लगता है.
"क्या आप अब भी सिंगल ही हो?" पूछने वाले की आंखें चमक उठती हैं. ऐसा लगता है कि आप अब भी प्लेस्कूल में ही हैं.
ऐसे मौक़ों पर मेरे कुछ दोस्त ही आगे बढ़ मेरे बारे में बताते हैं, "इस साल के आख़िर तक ये शादी कर लेगा."
इन दोस्तों को लगता है कि ऐसा बोलकर वो मुझे अपमान से बचा लेंगे. मेरी इच्छा होती है कि मैं कहूं, "अरे सुनो! मुझे अपनी पहचान से कोई शर्म नहीं है. और तो और जिस साल का आप ज़िक्र कर रहे हैं, वो कभी आएगा ही नहीं. "
और फिर क़रीबी लोग ही मेरा नाम लड़कियों के नाम से जोड़ना शुरू कर देते हैं, बिना ये सोचे कि हमारी उम्र में कितना फ़र्क़ है, हमारे ओहदे में कितना फ़र्क़ है. इस तरह की अफ़वाहें हर जगह फैलती रहती हैं.
लोगों को इस बात का अंदाज़ा ही नहीं होता कि उनके ऐसे व्यवहार के कारण उनके साथ मेरा संबंध ख़त्म हो रहा है. सच कहूं तो दुनिया में अच्छे दोस्तों का मिलना वैसे भी बेहद मुश्किल है.

Monday, October 1, 2018

बीजेपी विधायक के ख़िलाफ़ बलात्कार का केस पर गिरफ़्तारी नहीं

आख़िरकार रात में पुलिस द्वारा लोगों के उत्पीड़न के बारे में किसने नहीं सुना है. ऐसे में विवेक ने जो अपनी समझ से चुना, उसका नतीजा इतना ख़ौफ़नाक साबित हुआ.
साल 1960 में इलाहबाद कोर्ट के नामी न्यायाधीश रहे ए एन मुल्ला ने अपने एक फ़ैसले में कहा था, "मैं ये पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि पूरे देश में एक भी ग्रुप नहीं है जिसके अपराध का रिकॉर्ड, उस संगठित इकाई के क्राइम रिकॉर्ड से टक्कर ले सके जिसे इस देश में भारतीय पुलिस बल के नाम से जाना जाता है."
जब भी कोई ऐसी घटना सुनाई पड़ती है जिसमें पुलिस द्वारा किसी को गोली मारे जाने का उल्लेख होता है, हर बार मुझे 1960 का कोर्ट का वो फ़ैसला याद आ जाता है.
निश्चित तौर पर यूपी पुलिस के दृष्टिकोण में रत्ती भर बदलाव नहीं आया है. या ये कहें कि वक़्त के साथ पुलिस का दृष्टिकोण ख़राब ही हुआ है, तो ग़लत नहीं होगा.
कुछ महीने पहले ही यूपी के पुलिस चीफ़ रहे सुलखान सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ब्रिटिश काल की पुलिस भी ईमानदारी और व्यवहार के मामले में तुलनात्मक रूप से आज की यूपी पुलिस से बेहतर थी.
उन्होंने तो ये तक कहा था कि भले ही ब्रिटिश शासन में पुलिस भारतीय लोगों के प्रति असंवेदनशीलता रही हो, लेकिन उस दौर में फ़र्ज़ी जाँच या एनकाउंटर नहीं होते थे.
विवेक तिवारी का मामला कोई पहला मामला नहीं है, जब पुलिस ने किसी शख़्स को कार नहीं रोकने पर गोली मार दी हो. लेकिन जो बदलाव अब महसूस किया जा सकता है वो ये है कि हत्या का अभियुक्त पुलिसवाला एक घमंडी आदमी की शैली में ख़ुलेआम बयानबाज़ी भी कर रहा है.
वो कैमरे पर बिना किसी डर के अपने बयान बदल रहा है और उसके साथी थाने में मुस्कुरा रहे हैं.
पुलिसवाले का आरोप है कि विवेक तिवारी उनकी मोटरसाइकल पर कार चढ़ाकर, उन्हें मारना ही चाहते थे. लेकिन ज़्यादा चौंकाने वाली बात ये थी कि शुरुआत में उनके वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उनके दावों को सही भी मान रहे थे.
यदि मीडिया ने लगातार दबाव न बनाया होता तो लखनऊ के पुलिस अधीक्षक भी अपने सिपाही की बात ख़ुशी-ख़ुशी दोहरा रहे होते. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के बाद ही गोली चलाने वाले सिपाही प्रशांत चौधरी के ख़िलाफ़ धारा 302 के तहत क़त्ल का मामला दर्ज किया गया.
राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह से बात की. लखनऊ राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र भी है, वो मूकदर्शक कैसे बने रह सकते थे?
और फिर मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक ने घटना की आलोचना की और दोषियों पर सख़्त कार्रवाई सुनिश्चित करने का बयान दिया. पीड़ित परिवार का गुस्सा शांत करने के लिए सरकार ने 25 लाख रुपए की सहायता राशि की घोषणा भी कर दी और मृतक की पत्नी को लखनऊ नगर निगम में क्लर्क की नौकरी भी दे दी.
हालांकि, सभी ये सवाल ज़रूर पूछ रहे हैं कि क्या मुख्यमंत्री एनकाउंटर को लेकर अपनी नीति पर पुनर्विचार करेंगे. स्पष्ट तौर पर इसी नीत ने 'गोली चलाने को उत्सुक' पुलिसवालों का मनोबल बढ़ाया है. उत्तर प्रदेश के पुलिसवालों को अब आम तौर पर ये लगता है कि वो क़त्ल करके भी आसानी से बच जाएंगे.
बीते 12 महीनों में योगी की पुलिस ने प्रदेशभर में 1600 से अधिक एनकाउंटर किए हैं. इनमें 67 लोग मारे गए हैं जिनमें से अधिकतर ऐसे छोटे-मोटे अपराधी थे जिन पर पुलिस ने ईनाम घोषित करके उन्हें बड़ा बना दिया था.
एनकाउंटर में मारे गए कथित अपराधियों में से ज़्यादातर मुसलमान, दलित और अन्य पिछड़ा वर्गों से हैं. मुठभेड़ों के ये आंकड़े योगी सरकार के किसी वर्ग से भेदभाव न करने और सबका साथ सबका विकास के दावों की पोल खोलते हैं.
अलीगढ़ में जिस तरह कथित एनकाउंटर की लाइव कवरेज़ के लिए मीडिया कर्मियों को बुलाया गया वो उन्हीं पूर्वाग्रहों को मज़बूत करता है जिनसे यूपी पुलिस अपराध नियंत्रण कर रही है.
बीजेपी के कई नेता भी ये बात मानते हैं कि एनकाउंटर अभियान सरकार की अपराध के ख़िलाफ़ सख़्त छवि स्थापित करने के लिए ही चलाया जा रहा है. सरकार ये संदेश देना चाहती है कि वो क़ानून व्यवस्था को लेकर गंभीर है.
वो क़ानून व्यवस्था जो कथित तौर पर पूर्ववर्ती समाजवादी सरकार के कार्यकाल में बेहद चरमरायी हुई थी. लेकिन तथ्य ये हैं कि जघन्य अपराध पहले की तरह ही हो रहे हैं और बलात्कार के आंकड़ें बढ़ रहे हैं. बिडम्बना ये है कि इस सबके बावजूद मुख्यमंत्री की प्राथमिकता कथित 'लव जिहाद' रोकना, एंटी रोमियो स्कवायड बनाना और 'गो हत्या' रोकना ही है.
उन्नाव को वो चर्चित मामला तो हम सबको याद ही है जिसमें एक कथित गैंगरेप पीड़िता के पिता को थाने के अंदर ही बेरहमी से पीट-पीटर मार दिया गया. पुलिस ने आंखें मूंद लीं क्योंकि ये सब एक भाजपा विधायक के कहने पर हो रहा था. घटना के मीडिया में आने और हाई कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के बाद ही प्रदेश सरकार ने कार्रवाई की और विधायक को गिरफ़्तार कर लिया गया.
प्रकाश सिंह पुलिस सुधार समिति की सिफ़ारिशों और सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित दिशा-निर्देशें का पालन करके ही सरकार 'पुलिस व्यवस्था के बिगड़ रहे स्वास्थ्य' को ठीक कर सकती है.
इनमें से एक अहम सिफ़ारिश है पुलिस की क़ानून व्यवस्था बनाए रखने की भूमिका को जांच करने की भूमिका से अलग करना. प्रकाश सिंह पंजाब और यूपी पुलिस के प्रमुख रहने के अलावा बीएसएफ़ के महानिदेशक भी रह चुके हैं. उन्होंने एक स्वतंत्र जांच एजेंसी की स्थापना की स्पष्ट सिफ़ारिश की थी.
पांच साल पहले भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी इन सिफ़ारिशों पर अपनी मुहर लगा दी थी. लेकिन राज्य सरकारें इन्हें नज़रअंदाज़ करती रहीं. और अब नतीजा बिलकुल साफ़ है.
एप्पल के कर्मचारी विवेक तिवारी की मौत के मामले की जांच हत्या के अभियुक्तों के सहकर्मी ही करेंगे. वो पुलिस कर्मी जो क़ानून व्यवस्था लागू करने के अलावा आपराधिक मामलों की जांच करने की भूमिका भी निभाते हैं. और इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि ख़ून पानी से गाढ़ा होता है.
ऐसे में अगर पुलिस के जांचकर्ता अपने सहकर्मियों को बचाने के लिए मामले को हल्का करने की कोशिशें करें तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए. यही वजह है कि ऐसे मामले अक्सर सीबीआई के पास पहुंच जाते हैं. सीबीआई को आज भी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच एजेंसी तो माना ही जाता है, भले ही ऐसा नहीं हो.